रोग उपचार में कारगर सकारत्मक सोच – जानिए कैसे

सही दिनचर्या का अर्थ है व्यक्ति शारीरिक,मानसिक, आध्यात्मिक तीनों रूपों में अपना जीवन चलाता है| मन का प्रभाव शरीर पे पड़ता है और शरीर उसी तरह चलता है, जैसी उसकी सोच हो | सही सोच की कमी से वह हमेशा असंतुष्ट व दुखी रहता है |

साकारात्मक

साकारात्मक सोच किसी भी असाध्य समझे जाने वाले रोग के प्रति विशेषकर जोड़ो के दर्द में विचार सकारात्मक बनाए रखे | अपने अपको प्रसन्न रखे । ताजा खुली हवा में रहें। कष्ट पाकर भी व्यायाम, घूमना, प्राणायाम करते रहे।

मानसिक तनाव रक्त संचार प्रभावित करता है। इससे शरीर के अन्य अंग कार्य सही नहीं कर पाते |

पारिवारिक परिस्थितियाँ, सम्पति सम्बन्धी चिन््तायें, कामकाज का दबाव आदि व्यक्ति को तनावग्रस्त कर देती हैं। अतः तनाव से बच और हर काम को उचित समय में बिना भय और व्यवस्थित ढंग से पूरा करें।

जोश में होश नहीं खोएं, स्नान, कपड़े पहनने, नाश्ता और भोजन को पूरा समय देते हुए प्रसन्नता, बिना हड़बड़ी के करें। भोजन शान्ति से धीरे-धीरे चबा-चबाकर खाएं। खाना खाते समय खाने पर ही ध्यान रखें, उसका स्वाद अनुभव करें। अन्य विषयों पर नहीं सोचें।

व्यस्त रहो, लेकिन किसी भी कार्य के लिए अस्त-व्यस्त बेचैन नहीं हो, कार्य जीने से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। कार्य अपने समय के अनुसार करे | क्रोध आने पर उसे प्रकट कर दें और उसे भूल जाएँ। उतना ही काम करे जिससे थकान नहीं हो | आराम से शरीर को शिथिल कर लेटें। अपने मनपसन्द कार्यो में समय दें |

इससे आप में उत्साह बना रहेगा | नित्य व्यायाम, घूमने के लिए समय निकालें | ये आवश्यक है | जितना कमाते है उस पर संतोष रखें | ज्यादा कमाने, धन इकठा करने बुरे काम, रिश्वत, भ्रष्टाचार नहीं अपनाएँ | धन और प्रसिद्धि पाने के लिए हाय हाय नहीं करें | ज्यादा प्राप्ति की इच्छा नहीं करें | जोड़ो से ग्रस्त व्यक्ति भोजन क्षारीय करें, अम्लीय खट्टी चीजों का भोजन नहीं करें व नमक काम खाएं | लेक्टिक एसिड जिन चीजों मैं अधिक हो वे कम से कम खाएं | दूध, मक्खन, पनीर, क्रीम में लेक्टिक एसिंड ज्यादा होती है, ये कम खाएं |

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