तुलसी के पत्ते एवं बीज खाने के गुण, उपयोग एवं फायदे इन हिंदी

तुलसी खाने के फायदे

तुलसी के पौधे प्रायः सभी हिन्दू घरों में पाए जाते हैं तथा प्रत्येक हिन्दू घर में इन पौधों की पूजा पूरी श्रद्धा के साथ की जाती है। तुलसी परम रोगाणुनाशक पौधा है। इसी से तुलसी का प्रयोग संक्रामक रोगों के फैलने पर ही अधिकतम किया जाता है। श्वेत और काली तुलसी के प्राय: यही दो रूप हैं। हमारे यहां श्वेत तुलसी की पूजा का विधान ही अधिक है।

तुलसी के गुण

तुलसी चरपरी, कड़वी, अग्निदीपक, हृदय को हितकारी, गरम, दाह, पित्त, वृद्धिकर, मूत्रकृच्छ, कोढ़, रक्त विकार, पसली-पीड़ा तथा कफ, वातनाशक है | पाश्चात्य मत से श्वेत तुलसी उष्ण, पाचक एवं बालकों के प्रतिश्याय व कफ रोग में कार्यान्वित होती है। काली तुलसी शीत, स्निग्ध, कफ एवं ज्वरनाशक है फुसफुस के अन्दर से कफ निकालने के लिए काली मिर्च के साथ तुलसी के पत्तों का प्रयोग किया जाता है।

तुलसी का महत्त्व

वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि वास्तव में तुलसी का तेल क्षय रोग के कीटाणुओं को समाप्त कर देता है और मलेरिया को तुलसी द्वारा समाप्त किया जा सकता है।

पाश्चात्य डॉक्टरों ने अपने अनुभव के आधार पर बताया है कि आंतों की सफाई का सर्वश्रेष्ठ उपाय तुलसी दल को चबाकर खाना है। जैसे ही तुलसी का रस आंतों तक पहुंचता है आंतों में जमे तत्त्व उनसे अलग हो जाते हैं।

स्त्री रोगों पर तुलसी के सेवन का बहुत ही गुणकारी प्रभाव पड़ता है। चर्म रोग, सीने में दर्द, योनि भ्रंश, स्तन पीड़ा, प्रदर, योनि के अन्य रोग नष्ट करता है। भगोष्ठ को लटकने नहीं देता। प्रजनन तथा मूत्र की सुरक्षा करता है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि तुलसी की गन्ध में एक और गुण है। वह शरीर को सड़ने से रोकती है। अगर किसी शव के पास तुलसी के पौधे रख दिए जाएं तो वह तीन-चार दिन तक बिना सडे-गले सरक्षित रख रहेगा |

उससे बदबू भी नहीं फूटेगी। तुलसी की गन्ध नथुनों और श्वास की नलिकाओं में संक्रामक रोग के कीटाणुओं को प्रवेश नहीं करने देती और उनकी सफाई भी करती रहती है। श्वास द्वारा तुलसी की गंध शरीर में जाकर शरीर की भी सफाई कर देती है। केवल क्षय और मलेरिया के कीटाणु ही तुलसी की गंध से समाप्त नहीं हो जाते, अन्य रोगों के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व मलाया में मलेरिया की अधिकता को देखकर वहां की सरकार ने पार्कों में, वनों में खाली जमीन जहां भी थी वहां तुलसी के पौधे रोपने का एक जोरदार अभियान चलाया था। उसके परिणामस्वरूप महामारी के रूप में कुख्यात मलेरिया धीरे-धीरे कम होते हुए अब बिल्कुल समाप्त हो गया है। वहां के निवासी तुलसी के गुणों से भली-भांति परिचित हो चुके हैं। आज उनके घरों में तुलसी के एक-दो नहीं कई-कई पौधे लहलहाते दिखाई देते हैं।

अनेक होमियोपैथिक दवाइयां तुलसी के रस से तैयार की जाती हैं। मेथेरिया मेडिया में तुलसी के अनेक गुणों का उल्लेख किया गया है।

हमारे दैनिक जीवन में तुलसी का बहुत ही व्यापक उपयोग है। घर में हम अन्य फूलदार पौधे गमलों में लगाते हैं क्योंकि हर घर में कच्ची जमीन नहीं होती। हमें गमलों में तुलसी के भी दो-चार पौधे लगाने चाहिए। हालांकि जमीन में तुलसी का पौधा जिस तेजी से पनपता और विकसित होता है गमले में नहीं हो पाता। लेकिन इससे उसके गुणों में कोई अन्तर नहीं आता।

तुलसी का सेवन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। तुलसी का उपयोग करने के तत्काल बाद दूध नहीं पीना चाहिए। उससे कई रोग पैदा हो जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन दूध के साथ बताया गया है लेकिन तुलसी का सेवन गंगाजल, तुलसी के साथ शहद खाने के फायदे या फिर सामान्य पानी के साथ बताया गया है।

आयुर्वेद के मतानुसार, यदि कार्तिक मास में प्रातःकाल निराहार तुलसी के कुछ पत्तों का सेवन किया जाए तो वर्ष भर मनुष्य रोगों से सुरक्षित रहता है।

जब सूर्य या चन्द्रग्रहण होता है तो वायुमंडल दूषित हो जाता है। इस तथ्य को वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। उस समय घर में मौजूद जल और खाद्य सामग्री में तुलसी के पत्ते डाल दिए जाएं तो दूषित पर्यावरण का उन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता। यदि तुलसी के पत्तों को जल में कुछ देर पड़े रहने के बाद उस जल से स्नान किया जाए तो चर्म रोग नहीं हो पाते और यदि पीने के पानी में तुलसी के पत्ते डाल दिए जाएं तो वह पानी समस्त उदर विकारों को नष्ट कर देता है।

तुलसी के सेवन का मनुष्य के चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तुलसी के सेवन से विचार शुद्ध और पवित्र रहते हैं।

आध्यात्मिक विचार उत्पन्न होते हैं। वासना की ओर मन आकृष्ट नहीं हो पाता। मन में न तो वासनात्मक विचार उत्पन्न होते हैं न क्रोध ही आता है। तुलसी के नियमित सेवन से शरीर में चुस्ती-फुर्ती पैदा होती है। चेहरा कान्तिपूर्ण बन जाता है।

तुलसी रक्त विकार का सबसे बड़ा शत्रु है। रक्त में किसी भी कारण से विकार उत्पन्न हो गए हों, धोखे या जानबूझकर खा लेने पर विष रक्त में घुलमिल गया हो, तुलसी के नियमित प्रयोग से वह विष रक्त से निकल जाता है।

तुलसी के पौधे आंखों की ज्योति और मन को शान्ति प्रदान करते हैं। वातावरण में सात्विकता की सृष्टि करते हैं। तुलसी हृदय को सात्विक बनाती है। मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने की प्रेरणा का प्रयोग किया जाता है।

जीवन की सफलता मन की एकाग्रता पर बहुत कुछ निर्भर करती है। यदि मन एकाग्र न हो तो मनुष्य न तो भजन, पूजन, आराधना और चिन्तन-मनन कर सकता है न अध्ययन कर सकता है।

प्राचीन भारतीय तन्त्र-मंत्र ग्रन्थों में भी तुलसी का उल्लेख किया गया है। अनेक तांत्रिक और मान्त्रिक अनुष्ठानों में तुलसी का प्रयोग किया जाता है। तपोवन में रहकर विद्या प्राप्त करने वाले छात्रों के चरित्र की निर्मलता और विद्वत्ता के मूल आधार निश्चित रूप से तुलसी के वे पौधे ही होते थे जो आश्रम में जहां-तहां लहलहाते रहते थे। तुलसी के उपयोग से केवल रोगों से मुक्ति ही प्राप्त मत कीजिए। अपने तन- मन को शान्ति, शक्ति और ऊर्जावान बनाने के लिए भी तुलसी का प्रयोग कीजिए।

शास्त्रों में तुलसी का महत्त्व

शास्त्रों में कहा गया है-

त्रिकाल वित्रता पुत्र प्रयाश तुलसी यदि ।

विशिष्यते कायशुद्धिचान्द्रायण शतं बिना ॥

तुलसी गंधमादाय यत्र गच्छति मारुत ।

दिशो दशश्च पूतास्तुर्भूत ग्रामश्तुर्विथः॥

अर्थात् यदि प्रात: दोपहर और संध्या के समय तुलसी का सेवन किया जाए तो उससे मनुष्य की काया इतनी शुद्ध हो जाती है जितनी अनेक बार चन्द्रायण व्रत करने से भी नहीं होती। तुलसी की गंध वायु के साथ जितनी दूर तक जाती है, उसमें निवास करने वाले सभी प्राणी पवित्र-निर्विकार हो जाते हैं।

तुलसी की यह महिमा, गुण, गरिमा केवल कल्पना नहीं है |

तुलसी को अमृत क्यों माना गया

इसलिए कि वाणी (मुख, कण्ठ, दाँत दर्द का का उपचार, मसूढ़े, श्वास-नली और फेफड़े), मन (हृदय, मस्तिष्क, स्नायुमण्डल) और काया (पांव के अंगूठे से सिर के बालों तक) तुलसी नीरोग, पवित्र, सात्त्विक और निर्मल कर देती है।

तुलसी के दर्शन मात्र से ही रोग कट जाते हैं।

यह बात सोलह आने सच है कि तुलसी के पत्तों-शाखाओं से एक ऐसा रोगनाशक तल वायुमण्डल में उड़ता रहता है कि इसके आसपास रहने, इसे छूने, पौधा रोपने और उसे जल चढ़ाने से ही सैकड़ों रोग कट जाते हैं। इसकी गंध दसों दिशाओं को पवित्र करके कवच और ढाल की तरह प्राणियों को बचाती है

तुलसी नीम और शहद से भी अधिक गुणकारी

पद्यपुराण में लिखा है –‘संसार भर के फूलों और पत्तों के पराग या रस से जितने भी पदार्थ या दवाएं बनी हैं, तुलसी के आधे पत्ते से ही उन सबसे अधिक आरोग्य मिल जाता है।

तुलसी की मंजरी में जादू भरा है

तुलसी की मंजरी (बीजों का गुच्छा, बौर) जिस घर के आंगन में बिखर जाती है और जो मंजरी भिगोकर बदन पर छींटे देता है और फेर लेता है, समझो कि उसने रोगों से टक्कर लेने का कवच पहन लिया। इसके बीजों से उड़ते रहने वाला तेल त्वचा से छूकर रोम-रोम के विकार हर लेता है।

तुलसी में बिजलियां कौंधती-कड़कती हैं

तुलसी का नाम वृन्दा भी है अर्थात् विद्युत-शक्ति। इसलिए तुलसी की लकड़ी से बनी माला, गजरा, पाजेब और करधनी पहनने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है, क्योंकि इनसे बिजली की लहरें निकलकर रक्तसंचार में रुकावट नहीं आने देतीं। कलाई में तुलसी का गजरा पहनने से नब्ज नहीं छूटती, हाथ सुन्न नहीं होते, भुजाओं का बल बढ़ता है। कमर में तुलसी की करधनी पहनने से पँक्षाघात नहीं होता, कमर, जिगर, तिल्ली, आमाशय और यौनांग के विकार नहीं होते। गले में तुलसी माला पहनने से आवाज सुरीली निकलती है और मुखड़ा गोरा गुलाबी रहता है। हृदय पर झूलने वाली तुलसी-माला फेफड़ों और हृदय के रोगों से बचाती है।

भगवान शंकर ने भी तुलसी को उत्तम माना

नारद से स्वाम भगवान शिव से ये कहा है –

पत्र पुष्पं फलं मूलं त्वक् स्कन्ध संज्ञितम्,

तुलसी सम्भवं सर्व पावनं मृत्तिका दिकम्!

“तुलसी के पत्र, पुष्प, फल, मूल, त्वक् (छाल), स्कन्ध (तना) और मिट्टी, पौधे-तले की, सभी पवित्र और सेवनीय जानो।

अकाल मृत्युंहरणं सर्वव्याधि-विनाशनम्

चरणामृत देते हुए पुजारी लोग इसीलिए यह मंत्र पढ़ते हैं कि तुलसी दल के सम्मिश्रण से चुल्लुभर चरणामृत ही असमय की मौत से बचाता है और सब व्याधियों का विनाश कर देता है।

तुलसी से यमदूत भी भाग जाते हैं

सांप, कानखजूरा, मच्छर और बिच्छू के जहर से मौत भी हो जाती है, इसीलिए इन्हें यमदूत कहा जाता है। अगर घर में, आंगन में, सड़क किनारे और और लॉन में तुलसी की बगीची लगा दें तो सांप-बिच्छू वहां से अपने आप भाग जाएंगे। इसी कारण तुलसी वाले घर-आंगन को तीर्थ के समान माना जाता है क्योंकि वहां रोग-शोक, वहम-बीमारी टिक ही नहीं सकते। शास्त्र कहते हैं कि तुलसी के पत्ते-पत्ते और रेशे-रेशे में देवता (सद्गुण) निवास करते हैं, इसलिए देवताओं की उपासना (सदगुण-ग्रहण) करते हुए तुलसी का रोज सेवन करना चाहिए। तुलसी के पौधों की निराई-गुड़ाई के दौरान जो मिट्टी हाथ-मुंह, माथे या बदने को लग जाती है, वह भी त्वचा के सारे रोग काट देती है।

तुलसी – जैसा नाम वैसा गुण

तुलसी के कई नाम हैं जो इसके गुणों का इतिहास बताते हैं। वेदों, औषधि- विज्ञान के ग्रन्थों और पुराणों में इसके कुछ प्रमुख नाम-गुण इस प्रकार हैं-

कायस्था-क्योंकि यह काया को स्थिर रखती है।

तीव्रा- क्योंकि यह तीव्रता से असर करती है।

देव-दुन्दुभि- इसमें देव-गुणों का निवास है।

दैत्यघ्नि-रोग-रूपी दैत्यों का संहार करती है।

पावनी- मन, वाणी और कर्म से पवित्र करती है।

पूतपत्री – इसके पत्र (पत्ते), पूत (पवित्र) कर देते हैं।

सरला- हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है।

सुभगा- महिलाओं के यौनांग निर्मल-पुष्ट बनाती है। सरमा-रस (लालारस) ग्रन्थियों को सचेतन करती है।

सुरसा – रस (लालारस) ग्रंथियों को सचेतन करती है |

तुलसी से आंखों की सूजन का उपचार

तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर थोड़ी सी फिटकिरी पीस कर जाएगी मिला दें | गुनगुने काढ़े से रुई के फाहे द्वारा पलकों की सिकाई करें|सूजन मिट जाएगी और आंखें ठीक हो जाएंगी। आधा-आधा घंटे पर तीन-चार बार करें।

तुलसी से आंखों के रोहे का उपचार 

लक्षण

आंखों की पुतली लाल हो जाना, आंखों के भीतर करकराहट व खुजली।

उपचार

दस पत्ते तुलसी के और एक लौंग सिल पर बारीक पीसकर रस निचोड़ लीजिए। चार-चार घंटे बाद एक-एक बूंद ड्रॉपर से आंखों में डालिए।

तुलसी से आंख आना का उपचार

गर्मियों के मौसम में अक्सर बच्चों की आंखें दुखनी आ जाती हैं। यह एक संक्रामक रोग है। यदि किसी बच्चे की आंखें दुखनी आ गयी हों तो अन्य बच्चों को उससे दूर रखना चाहिए।

उपचार

तुलसी के पत्तों का रस निकालकर सलाई से आंखों में लगा दीजिए।

तुलसी के पत्तों के रस में थोड़ा सा शहद मिलाकर दोनों आंखों में ड्रॉपर से एक-एक बूंद डालिए। दिन में तीन-चार बार डालने से दूसरे दिन ही आंखें ठीक हो जाएंगी।

तुलसी से मोतियाबिन्द का उपचार

लक्षण

आंखें लाल हो जाना, आंखों में कीचड़ आना, निरन्तर दुखन का अनुभव होना|

कारण

तेज धूप में घूमना, आंखों की सफाई न करना, तेज रोशनी में पढ़ना।

उपचार

तुलसी के पत्तों का रस शहद खाने के गुण में मिलाकर सुबह-शाम लगाने से जाला कट जाता है। अगर जाला पक भी गया हो तो भी लाभ पहुंचाता है।

तुलसी से गुहेरी का उपचार

लक्षण

आंख में कीचड़ आना, बेचैनी बढ़ जाना, दर्द होना |

उपचार-

तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उंगली की पोर से गुहेरी पर में अगर एक लौंग भी घिस लें तो और भी जल्दी गुहेरी बैठ जाएगी |

उबलकर एक चौथाई रह जाए तो उसे नीचे उतार लें, फिर उसे बारीक कपड़े या छलनी से छान लें। छने हुए रस को निरंतर एक सप्ताह तक पीने से जिगर रोग ठीक हो जाएगा। भूख खूब लगेगी।

तुलसी से पाचन शक्ति बढ़ाएं

उपचार

जिन लोगों की पाचन शक्ति कम है उन्हें खाना-पीना ठीक से हजम नहीं हो पाता उनके लिए तुलसी के ताजा पत्ते पीसकर पानी में मिलाकर रोगी को पिलाने से उसकी पाचन शक्ति ठीक हो जाएगी। यह सेवन एक मास तक चलना चाहिए।

तुलसी से मोटापा का उपचार

जाने कितने ही लोग मोटापे का इलाज ढूँढ़ते – ढूँढ़ते दुःखी घूम रहे हैं, परन्तु उनके रोग का कहीं भी तो उपचार नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण उनकी चिंता और भी बढ़ गयी हैं।

लक्षण

स्तन और पेट पर भारीपन आना, कूल्हे भारी हो जाना, श्वास भारी होना, पेट का बढ़ना, पसीना अधिक आना, थोड़े परिश्रम से श्वास का फूलना।

कारण

अधिक मात्रा में चर्बी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन, आहार ठीक से चबाकर न खाना, गरम पानी से नहाना, दिन में सोना, मिठाइयों का अधिक सेवन।

उपचार

तुलसी के पत्तों का रस 10 बूंद, शहद बड़ा चम्मच, इन दोनों को एक गिलास पानी में मिलाकर सुबह-शाम एक मास तक पीने से आपका मोटापा कम हो जाएगा।

तुलसी से बवासीर का उपचार

लक्षण-

मल द्वार पर दानों का निकलना व उनसे रक्त निकलना, कब्ज रहना, प्यास अधिक लगना।

कारण

अधिक मात्रा में मीठे, चिकने, चटपटे पदार्थों का सेवन, मदिरा पान, अधिक संभोग, अतिशोक, अधिक उपवास, श्रम न करने, दिन में सोने, मल् त्याग के बाद मल द्वार की सफाई न करने से यह रोग हो जाता है।

उपचार

तुलसी के पत्ते (तीन या पांच) रोज सुबह खाएं। भोजन के साध पीने वाले पानी में पांच पत्तों के टुकड़े आधा घंटे पहले ही डाल दें।

तुलसी- दाल पीसकर मस्सों पर भी लेप करें। इस लेप में कपूर की आधी टिकिया भी शामिल कर लें। पढ़िए – बवासीर का घरेलू उपाय

तुलसी से नजला का उपचार

इसके लक्षण व कारण जुकाम के समान ही हैं। जिन्हें पुराना नजला हो उनके सिर के बाल जवानी में ही, बल्कि जवानी आने से पहले ही सफेद हो जाते हैं।

उपचार:

असमय का बुढ़ापा रोकने के लिए छांव में सुखाया तुलसी-दल तीन सौ ग्राम, दालचीनी पचास ग्राम, तेजपात सौ ग्राम, सौंफ दो सौ इलायची सौ ग्राम, अगिया घास तीन सौ ग्राम, बनफशा पच्चीस ग्राम, दो सौ ग्राम, रख लें। इसमें से तोलाभर मिश्रण आधा किलो पानी में एक कप रह जाने पर दूध चीनी मिलाकर पी लें। चाय की जगह अगर इसी को सुबह-शाम पीने की आदत बना लेंगे तो नजला-जुकाम भी जाते रहेंगे और शरीर में भी स्फूर्ति भरी रहेगी।

तुलसी से इनफ्लुएंजा का उपचार

दस ग्राम तुलसी के पत्ते ढाई सौ ग्राम पानी में उबालिए। जब पानी आधा जल जाए तो उसमें थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर गुनगुना ही पिलाएं। थोड़ी देर बाद पसीना आ जाएगा और बुखार कम हो जाएगा। तीन-चार दिन में बुखार बिल्कुल खत्म हो जाएगा।

पचास ग्राम तुलसी के पत्ते, पांच काली मिर्च आधा किलो पानी में उबालिए। जब पानी आधा रह जाए, सुबह, दोपहर और शाम को दो-तीन दिन गुनगुना करके पिलाएं। दो दिन में ही रोग से छुटकारा मिल जाएगा।

दस ग्राम तुलसी के पत्ते, दस ग्राम अजवायन और दस ग्राम सोंठ पीसकर चूर्ण बना लें, थोड़ा सा चूर्ण खाएं। दो घंटे में अगर बुखार न उतरे तो तीन- तीन घंटे के बाद चूर्ण को चटाते रहें। दो दिन में ही फ्लू खत्म हो जाएगा।

तुलसी से खांसी का उपचार

कारण

खांसी किसी भी कारण से उठ रही हो, यह स्वयं कोई रोग नहीं है बल्कि किसी रोग की चेतावनी है |

उपचार

सूखी खांसी हो तो तुलसी के बीज, अदरक और प्याज खाने के फायदे समान उपचार मात्रा में लेकर कूटें और शहद मिलाकर चटा दें।

तर खांसी हो तो तुलसी के सूखे पत्ते पीसकर मिश्री मिलाएं और पांच ग्राम लेकर फंकी मारें, ऊपर से दो घूंट पानी पिएं। फेफड़ों तक की घरघर जातो रहेगी। मिश्री की जगह शहद मिलाएं तो और भी अधिक प्रभाव होगा।

खांसी-नाशक चस्केदार गोलियां बना लीजिए। दस ग्राम तुलसी-दल, दस ग्राम पीपरी, दस ग्राम कत्था, दस ग्राम काली मिर्च, बीस ग्राम अनारदाना और पांच ग्राम जौखार में सौ ग्राम गुड़ पीसकर चने बराबर गोलियां बना लें। चूसकर चटखारे भी लीजिए और खांसी से भी छुटकारा पाइये ।

तुलसी से सूखी खांसी का उपचार

तुलसी की मंजरी, सोंठ और प्याज समान मात्रा में पीसकर शहद में चाटें। इससे दमा तक ठीक हो जाता है। सूखी खांसी इस उपचार से खुद ही सूख जाएगी। खांसी (सूखी) भी हो और छाती भी घरघराने लगे तो तुलसी के बीज और मिश्री बराबर मात्रा में पीसकर तीन-तीन ग्राम फांकें और पानी पी लें। चौबीस घंटों में न खांसी रहेगी न खुश्की, न सीना घरघराएगा और न सीटियों जैसी आवाजें निकलेंगी।

तुलसी से बलगम बढ़ जाना (बलगमी खांसी) का उपचार

तुलसी इसके लिए विशेष हितकारी है। कटु और तिक्त होने से कफ क जड़ से उखाड़ देती है।

उपचार

काली तुलसी का रस एक-एक चम्मच सुबह, दोपहर और राव को पिलाएं।

खांसी और सीने में घर-घर हो तो तुलसी की सूखी पत्तियों का चू मिश्री में मिलाकर चटाएं।

काली तुलसी का रस और छोटी मधुमक्खियों का शहद मिलाकर चटाइए। एक सप्ताह में सीना स्वच्छ हो जाएगा और बलगम या खांसी का नाम ही नहीं रहेगा।

तुलसी से जूं लीख का उपचार

तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उसमें नीबू निचोड़कर अच्छी फेंट लें। उंगलियों के पोरुओं से रगड़-रगड़ कर बालों की जड़ों में लगाएं। आधे घंटे बाद बालों को धो डालें। सारी जूं व लीख मर जाएंगी। कंघी से बाल काढ़ लें।

तुलसी से मुंहासे का उपचार –

लक्षण

चेहरे पर छोटी-छोटी फुंसियां निकलना, फोड़ने पर सूजन होना, काले निशान पड़ना, चेहरे का कुरूप होना।

कारण

गर्म व चिकनाई युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन, काम क्षुधा का शांत न होना |

उपचार

तुलसी-रस में नीबू-रस समान मात्रा में मिलाकर रोजाना मुंहासों पर मलिए। पूरे मुखड़े पर मलने से कान्ति बढ़ती है।

शक्ति और कान्ति के लिए तुलसी और तांबे का संयोग वैज्ञानिक कसौटी पर खरा पाया गया है। इसीलिए मन्दिरों में चरणामृत हमेशा तांबे के पात्रों में तैयार किया जाता है। अगर तुलसी और नीबू-रस के साथ काली कसौंदी का रस मिलाकर, तांबे की कटोरी में भरकर, धूप में सुखाकर गाढ़ा किया जाए तो मुहासों पर इसका लेप तुरन्त असर करता है। त्वचा निर्मल और बेदाग होकर चमकदार बनेगी।

जानिए – चेहरे से कील मुंहासे हटाने के घरेलू उपाय

तुलसी से दाग-चकत्ते का उपचार –

काली तुलसी के पत्ते, काली करौटी के पत्ते और नीबू का रस समान मात्रा में किसी तांबे के बर्तन में डालकर धूप में रख दें। जब गाढ़ा हो जाए तो दाग-चकत्तों पर लेप कर दें। इससे मुंहासे और सफेद दाग भी नष्ट हो जाते हैं।

तुलसी से झाइयां का उपचार –

तुलसी और नीबू-रस समान मात्रा में लेकर किसी शीशी में भर लें। रूई भिगोकर दिन में जब चाहें झाइयों पर लगा दें। सप्ताह भर में झाइयां घुल जाएंगी। वैसे इसका असर आपको एक ही दिन के प्रयोग से झलकने लगेगा।

तुलसी से रक्त विकार का उपचार –

तुलसी का पंचांग-पत्ते, बीज, फूल, जड़, लकड़ी को समान मात्रा में लेकर कूट-पीस कर छाया में सुखा लें। इसे तीन ग्राम रोज सुबह ताजा पानी के साथ निगल लें। रक्त के सारे दोष शान्त हो जाएंगे।

जानिए – उच्च रक्तचाप के लक्षण व उपचार

तुलसी से घाव के कीड़े का उपचार –

अगर किसी फोड़े में कीड़े पड़ जाएं तो काली तुलसी के पत्ते। छाया में सुखाकर पीस लीजिए और उस पाउडर को घाव में भर दीजिए। अगर उसमें कपूर की एक टिकिया भी पीसकर मिला लें तो और भी जल्दी आराम हो जाएगा।

जलन उपचार

जलन यदि छाती, पेट या पिंडलियों में हो तो तुलसी के पत्ते और देवदार की लकड़ी समान मात्रा में लेकर घिस लें और चन्दन की तरह जहां-जहां जलन हो रही हो लेप कर दें। थोड़ी देर में ही जलन मिट जाएगी।

तुलसी से कोढ़ (CANCER) का उपचार –

इस रोग का इलाज तुलसी उद्यान में निवास और तुलसी-रस्स का निरंतर सेवन ही है। उंगलियां गल गई हों, हड्डियों तक कोढ़ असर कर गया हो, तब भी तुलसी में इतनी शक्ति है कि कोढ़ी को निर्मल और नीरोग कर दे सफेद कोढ़ हो तो पांच पत्ते तुलसी के सुबह चबाएं, पांच दोपहर को और पां सूर्यास्त से पहले। तुलसी की जड़ की मिट्टी में तुलसी-दल घोटकर दागों पर ले करें। गलित कोढ़ हो तो तुलसी की जड़ और सोंठ का चूर्ण गर्म पानी से निग जाएं। शुरुआत ही हो तो तुलसी-रस और शहद का योग चाटें। भीषण रूप में क फूट चुका हो तो तुलसी-रस और गोमूत्र मिलाकर सुबह-शाम पिएं और वही ग हुए अंगों पर भी लगाएं। यह इलाज साल-सालभरजरीजना है।