मानव शरीर पंचतत्व कौन कौन से हैं, इनका महत्त्व एवं संतुलित करने की विधि

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पांच तत्व कौन कौन से हैं (What are the five elements of Human body in Hindi)

मानव-शरीर पांच तत्त्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। अत: अपने शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हमें इन पांचों तत्त्वों का उचित मात्रा में सेवन करना चाहिए।

1. पृथ्वी तत्त्व :

यह तत्त्व सभी प्रकार के अनाज, दालों व चावल आदि से मिल जाता है। पृथ्वी तत्त्व को पचाने के लिए सर्वाधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, अन्यथा शरीर में विकार हो जाने की सम्भावना रहती है।

2. जल तत्त्व :

इस तत्त्व को जल तथा सभी प्रकार की सब्जियों एवं सागों से प्राप्त किया जा सकता है | विशेष रूप से ज़मीन के ऊपर उगने वाली सब्जियां, जैसे लौकी, पालक, गोभी, तोरी, परवल और बथुआ आदि तथा ज़मीन के भीतर पैदा होने वाली तरकारियां – जैसे आलू, गाजर, मूली, शकरकन्द अथवा जिमीकन्द आदि।

3. अग्नि तत्त्व :

यह तत्त्व मुख्यत: फलों में पाया जाता है। फल सूर्य की गरमी पाकर पकते हैं। इसीलिए इनमें रंग भी होता है और मिठास भी। फल दो प्रकार के होते हैं:

(a) रसदार फल, जिनमें रस अधिक होता है, लेकिन पोषक तत्त्व कम होते हैं तथा

(b) गूदेदार फल, जिनमें रस कम होता है, लेकिन पोषक तत्त्व अधिक होते हैं।

4. आकाश तत्त्व :

प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्रत्येक तत्त्व का सेवन किया जाता है, जो आवश्यक भी होता है, लेकिन आकाश तत्त्व का सेवन नहीं किया जा सकता। इसे केवल उपवास करके ही प्राप्त किया जा सकता है।

5. वायु तत्त्व :

यह तत्त्व विशेष रूप से पत्तियों में पाया जाता है तथा इसे हम परोक्ष रूप से श्वास द्वारा भी प्राप्त कर सकते हैं।

स्वास्थ्य रक्षा के लिए पांच तत्व संतुलन विधि – दिनचर्य एवं आहार

स्वास्थ्य रक्षा के लिए हमें कुछ नियमों का पालन करना चाहिए, जो आगे बताए जा रहे हैं –

1. सूर्योदय से पहले ब्रह्ममुहूर्त में सोकर उठने के बाद, खड़े होकर एड़ियां उठाकर एक से पांच गिलास तक पानी पियें। इस प्रकार एड़ियां उठाकर पानी पीने से शरीर खिंच जाता है, आंतें खुल जाती हैं और पानी आंतों से होकर आगे बढ़ने लगता है, जिसके कारण मल-शुद्धि आसानी से हो जाती है। बुद्धि, स्वास्थ्य एवं दीर्घायु के लिए यह क्रिया बहुत आवश्यक है।

2. इसके बाद कम-से-कम पन्द्रह मिनट केवल छाती को फुलाते हुए (पेट को नहीं) प्राणायाम अथवा शारीरिक व्यायाम, जैसे तेज़-तेज़ चलना, दौड़ना, तैरना आदि अवश्य करें। फेफड़ों के स्वास्थ्य तथा सामान्य रक्त-सञ्चालन के लिए यह अत्यावश्यक है।

3. प्रात: दस बजे तक, अर्थात् सूर्य के लगभग ऊपर आ जाने तक खाने-पीने में कोई ठोस आहार न लें। हां, गर्मियों में शिकंजी, लस्सी, बादाम की ठण्डाई अथवा कुछ मौसमी फल ले सकते हैं या सर्दियों में थोड़ा गरम दूध अथवा बादाम या छुहारे मिला दूध ले सकते हैं।

4. प्रात: दस बजे के बाद एक बजे तक नियमपूर्वक दोपहर का भोजन कर सकते हैं, जिसमें रोटी, दाल, सब्जी, चावल, दही, सलाद आदि सात्त्विक पदार्थ ही हों। लेकिन प्रत्येक ग्रास को भली प्रकार- लगभग बत्तीस बार-चबा- चबाकर खायें और भूख से कुछ कम खायें। शरीर में रक्त की वृद्धि और अच्छी पाचनशक्ति के लिए यह आवश्यक है।

5. दोपहर का भोजन करने के बाद थोड़ी देर विश्राम करें। मन को शान्त रखें, मानसिक तनाव, क्रोध अथवा चिन्ता से बचें तथा प्रसन्नचित्त रहने की आदत डालें। किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों के सेवन से बचें। मानसिक स्वास्थ्य तथा उच्च एवं निम्न रक्तचाप व हृदयरोगों से बचने के लिए यह आवश्यक है।

6. उपर्युक्त सावधानियों के अतिरिक्त जीवन को सामान्य बनाये रखने के लिए अति से बचें, चाहे वह भोजन में हो, बोलने-बातचीत करने में हो अथवा समय या पैसा खर्च करने में हो।

7. भोजन में जहां तक सम्भव हो सके, अंकुरित पदार्थों का सेवन अधिक करें। अंकुरित पदार्थ अग्नि पर नहीं पकाये जाते। इसीलिए इनके विटामिन व अन्य पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते। इसके अतिरिक्त इनमें रूखापन अधिक होता है, जिसके कारण मल-शुद्धि का कार्य अच्छी प्रकार हो जाता है। इसको चबाने से दाँत, जबड़ा, और मस्तिष्क को पर्याप्त लाभ पहुँचता है | अंकुरति पदार्थ अधिक मात्रा में नहीं खाये जा सकते, जिसका सीधा लाभ आपकी पाचनशक्ति पर पड़ता है पदार्थो में सभी पोषक तत्त्व विद्यमान होते हैं, जिसके कारण ये आसानी से पच जाते हैं।

8 . सब्जियों व तरकारियों में भरपूर मात्रा में विटामिन होते हैं। इसीलिए ये आसानी से पच जाती हैं। अत: सब्जियों को काटने से पहले धो लें; क्योंकि काटने के बाद धोने से शरीर को लाभ पहुंचाने वाले तत्त्व, पानी में घुल जाने वाले विटामिन-सी और विटामिन-डी बह जाते हैं।

इसी प्रकार सब्जियों को उबालने से सत्तर प्रतिशत प्रोटीन सख़्त हो जाता है, जिसे पचाने के लिए आंतों को अधिक श्रम करना पड़ता है।

9 . पंच तत्त्वों में सर्वाधिक लाभकारी और महत्त्वपूर्ण आकाश तत्त्व है; क्योंकि यह अन्य चारों तत्त्वों की उत्पत्ति का आधार है। पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा तथा सूर्य से सैकड़ों गुणा बड़े पिण्डों का विकास आकाश तत्त्व से ही हुआ है।

आकाश तत्त्व इन पिण्डों से भी पहले विद्यमान था। इसलिए सृष्टि के निर्माण में आकाश तत्त्व की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण रही है। वास्तव में आकाश तत्त्व अन्य चारों तत्त्वों की माता है। इससे विशाल तत्त्व दूसरा कोई नहीं।

आकाश के सम्मुख सूर्य अथवा अन्य ग्रह समुद्र की बूंद का हज़ारवां भाग भी नहीं हैं। आकाश तत्त्व सभी जीवों के शरीर में अन्य सभी तत्त्वों को स्थान प्रदान करता है। अतः आकाश तत्त्व जितना अधिक होगा, क्रिया उतनी ही सुचारू रूप से होगी। आकाश तत्त्व को बढ़ाने के लिए उपवास सर्वश्रेष्ठ साधन है।

प्रातः काल का नाश्ता बन्द करना या प्रात: दस-ग्यारह बजे तक पेय पदार्थ अथवा रस आदि के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं लेना चाहिए। जिस प्रकार कमरे की सफ़ाई करने के लिए अच्छी और साफ़ वस्तुओं को भी कमरे से बाहर निकालकर ही उचित सफ़ाई की जाती है, उसी प्रकार शरीर की सफ़ाई के लिए भी अच्छे और स्वादिष्ट भोजन को छोड़ना आवश्यक है।

प्रातः काल जीवनी-शक्ति शरीर की सफ़ाई में लगी रहती है। अत: उस समय आप जल, नींबू, शहद अथवा पेय पदार्थों को छोड़कर अन्य पदार्थ ग्रहण न करें।

आप यह भी जानते हैं कि आहार की दृष्टि से पृथ्वी तत्त्व और आकाश तत्त्व एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए शरीर में आकाश तत्त्व बढ़ाने के लिए अन्न अर्थात रोटी, चावल व दाल आदि का सेवन कम करें एक समय ही करें; क्योंकि पृथ्वी तत्त्व के बढ़ने से जीवनी शक्ति घटती है तथा आकाश शक्ति बढ़ती है।

उपवास एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है, जो किसी भी बीमारी के दूर न होने पर अथवा चिकित्सा के सभी उपाय विफल हो जाने पर किया जाता है।

वैज्ञानिकों ने चूहों पर प्रयोग करने के बाद यह घोषणा की है कि कैंसर से बीमार चूहों को कुछ दिन भूखा रखकर देखा गया, तो उनमें कैंसर की वृद्धि रुक गयी तथा कुछ समय पश्चात् वे कैंसर से पूर्णत: मुक्त हो गये।

अब तक डॉक्टरों का ध्यान विभिन्न बीमारियों के समूहों पर गया है, लेकिन पेट पर नहीं गया, जबकि पेट के भीतर भरी गन्दगी के कारण ही अन्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। रोगों का घर केवल पेट है। योगशास्त्र में कहा गया है – सर्वरोगाः

मलाशयः, अर्थात् सभी रोग मलाशय में भरे हुए हैं। आज अनेक एलोपैथिक डॉक्टर भी इस तत्त्व को पहचान गये हैं और बीमार होने पर स्वयं अथवा अपने परिजनों को दवाएं नहीं खिलाते, केवल उपवास के आधार पर ही चिकित्सा कर लेते हैं ।

वे समझ चुके हैं कि पेट को साफ़ रखने अथवा कब्ज को पूर्णत: समाप्त करने के लिए संसार में आज तक कोई दवा नहीं बन सकी। यदि कुछ है, तो केवल आहार में परिवर्तन ही है। दवा के बिना, केवल पथ्य द्वारा ही अनेक रोगों को दूर किया जा सकता है।

कब्ज़ियत को दूर करके रखे पंच तत्वों को संतुलित – जानिए कैसे

1.  इसके लिए सबसे पहले आहार कम व हलका होना आवश्यक है, ताकि पाचन-क्रिया आसानी से हो सके।

2. भोजन के साथ तीन घूंट से अधिक पानी नहीं पीना चाहिए। हां, भोजन करने से आधा घण्टा पहले अथवा एक घण्टे बाद आप जितना चाहें, पानी पी सकते हैं।

3. लम्बे श्वास लेने से शरीर को वायु व आकाश तत्त्व अधिक मिलता है तथा अधिक ऑक्सीजन भोजन को पचाने में सहायक होती है।

4. भोजन को भली प्रकार चबाकर खाना चाहिए; क्योंकि पाचन-क्रिया मुंह से आरम्भ हो जाती है।

5. भोजन करते समय केवल भोजन का ही आनन्द लें। उस समय किसी भी प्रकार का आवेश मन में न आने दें; क्योंकि इस प्रकार पाचन प्रणाली सिकुड़ जाती है तथा पाचन-क्रिया में बाधा पड़ती है।

6. भोजन के बाद मूत्र-विसर्जन अवश्य करें। इससे पेट में किसी प्रकार का तनाव नहीं रहता, पेट हलका हो जाता है तथा भोजन को पेट में उचित जगह प्राप्त हो जाती है।

7. भोजन के बाद कुछ देर विश्राम करें।

8. सप्ताह में एक दिन या महीने में दो दिन या वर्ष में दो दिन उपवास अवश्य करें। यदि इस पर भी मल-शुद्धि न हो, तो चोकर-युक्त आटे का प्रयोग करें अथवा दो चम्मच त्रिफला चूर्ण या छोटी हरड़ या काले नमक का चूर्ण प्रयोग में लायें। यदि इस पर भी लाभ न हो, तो एनीमा का प्रयोग करें। प्राय: दस में से नौ रोगी क़ब्ज़ के कारण ही बीमार रहते हैं।

उपवास करने या एनीमा देने से उनके पेट से मल व आंव पूर्णत: निकल जाती है और तब उनका शरीर स्वच्छ हो जाता है। उपर्युक्त बातों के साथ निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना भी बहुत आवश्यक है।

प्राय: लोगों को यह पता ही नहीं होता कि वह किस वस्तु के साथ दूसरी किस वस्तु को मिलाकर खायें। इस तथ्य का सही ज्ञान न होने पर खाद्य-मिश्रण ज़हर बन जाता है।

1. भोजन के बाद पानी न पियें। भोजन के बाद पानी ज़हर का काम करता है।

2. स्टार्चयुक्त भोजन के साथ खट्टे पदार्थों का सेवन न करें; मुंह के अन्दर अम्लीय माध्यम बन जाता है, जिससे पाचन क्रिया में बाधा पहुंचती है।

3. खट्टे फलों को मीठे फलों के साथ नहीं खाना चाहिए।

4. नीबू, टमाटर, दही व छाछ आदि का प्रयोग भोजन से पहले अवश्य किया जा सकता है।

5. फलों का सेवन भी बिल्कुल अलग करना चाहिए। फल प्राय: दो घण्टे में पच जाते हैं, लेकिन देर से पचने वाले पदार्थों के साथ फलों का सेवन करने से उनका पाचन देर से होता है।

6. दूध या अन्य खाद्य पदार्थों के साथ चीनी आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे पाचन में देर लगती है।

7. घी व तेल आदि का सेवन कम-से-कम किया जाना चाहिए तथा तले हुए पदार्थों से बचना चाहिए। तले हुए पदार्थों के पाचन में देर लगती है।

8. स्टार्चयुक्त भोजन को सब्जियों के साथ मिलाकर खाया जा सकता जैसे अनाज, चावल, गेहूं, बाजरा, ज्वार, मक्का व सूजी के साथ आलू, अरबी पत्तेदार सब्जियां, बथुआ, मेथी, पुदीना, शकरकन्द, जिमीकन्द, धनिया, गाजर, मूली, गोभी, मटर, सेम, भिण्डी, टिण्डा, शलजम व चुकन्दर आदि का सेव किया जा सकता है।

9. इसी प्रकार प्रोटीन को भी सब्जियों के साथ लिया जा सकता है। दालें, चना, राजमां, पनीरं आदि के साथ सब्जियों का प्रयोग किया जा सकता है।

10. दूध को केले व आम के साथ लिया जा सकता है।

11. कुछ सब्जियों व टमाटर के साथ दही का सेवन किया जा सकता है।

12. अंकुरित पदार्थ सर्वश्रेष्ठ खाद्य-पदार्थ माने जाते हैं। चना, मूंग, मोठ, साबुत उड़द, सोयाबीन, गेहू, मूंगफली तथा मेथी आदि को अंकुरित किया जा सकता है। यदि इन पदार्थों को आठ-दस घण्टे के लिए पानी में भिगोकर रखने के बाद किसी कपड़े में बांधकर टांग दिया जाये, तो दस-बारह घण्टे बाद उनमें अंकुर फूट निकलते हैं, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति खा सकता है। लेकिन जिन व्यक्तियों को गैरा बनने की समस्या हो, उन्हें उड़द नहीं खानी चाहिए।

13. गेहूं को भी प्रत्येक व्यक्ति खा सकता है।

14. मधुमेह के रोगियों को अंकुरित मेथी अवश्य खानी चाहिए, लेकिन मीठे पदार्थ बिल्कुल नहीं खाने चाहिए।

15. फल धूप में पकते हैं, इसीलिए फलों में अग्नि तत्त्व अधिक मात्रा में होता है। लेकिन सब्जियों में जल तत्त्व अधिक मात्रा में होता है। इसीलिए फल और सब्ज़ियां शीघ्र पच जाती हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से इन्हें उत्तम खाद्य-पदार्थ माना जाता है। यदि इनका रस निकालकर सेवन किया जाये, तो केवल एक घण्टे में इनका पाचन हो जाता है और ये शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं। फलों को पकाकर नहीं खाया जाता। इसीलिए वे पौष्टिक और स्वादिष्ट होते हैं। इसके अतिरिक्त यदि आप एक अमृत-वचन का ध्यान रखेंगे तो जीवन-भर बीमारियों पर नियन्त्रण रख सकेंगे। वह अमृत-वचन है- ठोस आहार को पियें और तरल आहार को खायें